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अर्जुन देवांगन कि रिपोर्ट : बड़े जम्हरी में कोया पुनेम एवं संवैधानिक विषयों पर पाँच दिवसीय संभागीय स्तरीय प्रशिक्षण शिविर संपन्न*

*कोया पुनेम एवं संवैधानिक विषयों पर पाँच दिवसीय संभागीय स्तरीय प्रशिक्षण शिविर संपन्न*

अबूझमाड़ क्षेत्र में स्वशासन, ग्राम सभा सशक्तिकरण एवं आदिवासी अधिकारों पर हुआ गहन विचार विमर्श

नारायणपुर (छत्तीसगढ़), 19 जनवरी 2026

अबूझमाड़ क्षेत्र के करंगाल परगना अंतर्गत बड़े जम्हरी ग्राम में 15 से 19 जनवरी 2026 तक कोया पुनेम एवं संवैधानिक विषयों पर पाँच दिवसीय संभागीय स्तरीय प्रशिक्षण शिविर का सफल आयोजन किया गया। गोंडवाना समाज समन्वय समिति करंगाल परगना के तत्वावधान में आयोजित हुआ, जिसमें नारायणपुर जिले सहित आसपास के आदिवासी अंचलों से बड़ी संख्या में प्रतिभागियों ने भाग लिया।

यह प्रशिक्षण शिविर आदिवासी समाज की परंपरागत शासन व्यवस्थाओं, संवैधानिक अधिकारों, वन अधिकारों, ग्राम सभा की केंद्रीय भूमिका तथा स्वशासन को सशक्त बनाने के उद्देश्य से आयोजित किया गया।

*प्रथम दिवस : आदिवासी पारंपरिक व्यवस्थाओं की गहन समझ*

प्रथम दिवस के सत्र में पाटा गुरु विष्णु देव पद्दा जी ने नार व्यवस्था, गोंडरी टेक्नोलॉजी, वेडा, कोनाड, गोडुम डिपा, गुट्टा एवं मेट्टा जैसी आदिवासी समाज की सर्वोच्च पारंपरिक व्यवस्थाओं पर विस्तार से प्रकाश डाला।

उन्होंने बताया कि नार व्यवस्था आपसी सहयोग, अनुशासन, समानता एवं सामूहिक जिम्मेदारी पर आधारित आदिवासी जीवन पद्धति की रीढ़ है, जो आज भी सामाजिक संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

*द्वितीय दिवस : परंपरा, शिक्षा और वन अधिकार*

द्वितीय दिवस के दूसरे सत्र में तिरुमाल जगत मरकाम जी ने आदिवासी समाज की तीन प्रमुख परंपरागत व्यवस्थाओं— टोंडा, मंडा, कुंडा संस्कार के सामाजिक, सांस्कृतिक एवं व्यावहारिक महत्व को रेखांकित किया।

तीसरे सत्र में डॉ. रीना कोमरे ने शिक्षा के महत्व पर विचार रखते हुए कहा कि शिक्षा केवल डिग्री तक सीमित नहीं, बल्कि विवेक, आत्मनिर्भरता एवं सामाजिक जागरूकता की नींव है, जो समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाती है।

चौथे सत्र में तिरुमाल बलदेव पडोटी जी द्वारा वन अधिकार मान्यता अधिनियम, 2006 (FRA) पर अत्यंत महत्वपूर्ण एवं व्यवहारिक जानकारी साझा की गई। उन्होंने सामुदायिक अधिकार (CR), सामुदायिक वन संसाधन अधिकार (CFR), हेबिटेट राइट्स, पारंपरिक ज्ञान, जैव विविधता तथा बौद्धिक संपदा अधिकारों पर ग्राम सभा की निर्णायक भूमिका को उदाहरणों सहित स्पष्ट किया।

*चतुर्थ दिवस : पेसा कानून और स्वशासन की अवधारणा*

चौथे दिवस के सत्र में सचिन आत्राम ने बताया कि जंगल संरक्षण, संवर्धन, प्रबंधन एवं पुनर्जनन सीएफआरएमसी (सामुदायिक वन संसाधन प्रबंधन समिति) के माध्यम से ग्राम सभा द्वारा प्रभावी ढंग से किया जा सकता है। उन्होंने जोर दिया कि ग्राम सभा तभी सशक्त होगी जब गांव का प्रत्येक व्यक्ति उसमें सक्रिय भागीदारी करेगा और सामुदायिक संसाधनों का प्रबंधन स्वयं ग्राम सभा के हाथों में होगा।

चौथे दिवस के तीसरे सत्र में केबीकेएस के तिरुमाल अश्वनी कांगे जी ने पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 (पेसा कानून) पर विस्तारपूर्वक जानकारी दी। उन्होंने बताया कि यह कानून भूरिया समिति की सिफारिशों के आधार पर लागू किया गया, जिसका उद्देश्य अनुसूचित क्षेत्रों में निवासरत समुदायों को स्वशासन का अधिकार देना है। उन्होंने पेसा कानून की प्रमुख विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि —

* ग्राम सभा सर्वोच्च इकाई है

* गौण वनोपज पर स्वामित्व अधिकार ग्राम सभा को प्राप्त है,

* जल, जंगल और जमीन पर स्थानीय समुदाय का नियंत्रण सुनिश्चित है,

* भूमि अधिग्रहण से पूर्व ग्राम सभा की सहमति अनिवार्य है,

* नशा नियंत्रण, बाजार प्रबंधन एवं पारंपरिक विवाद निपटारे का अधिकार ग्राम सभा के पास है,

* पेसा नियमों के अंतर्गत संसाधन योजना एवं प्रबंधन समिति और शांति एवं न्याय समिति जैसी स्थायी समितियों का प्रावधान दिया गया है।

शिविर का समग्र महत्व*

यह पाँच दिवसीय प्रशिक्षण शिविर प्रतिभागियों के लिए अधिकारों की समझ, परंपरागत ज्ञान एवं संवैधानिक जागरूकता को मजबूत करने वाला सिद्ध हुआ।

शिविर ने यह स्पष्ट किया कि ग्राम सभा का सशक्तिकरण, स्वशासन तथा सामुदायिक संसाधनों पर नियंत्रण ही आदिवासी समाज के आत्मनिर्भर एवं सुरक्षित भविष्य की आधारशिला है।

5 दिवसीय संभाग स्तरीय कार्यक्रम को सफल बनाने में लखन मंडावी कारंगल परगना अध्यक्ष, चैनू करंगा , संतु पटावी करंगाल परगना उपाध्यक्ष, शंकर करंगा,परगना सचिव सुक्कु सलाम, सोहन उईके,वजन करंगा,लच्छु करंगा एवं आदिवासी समाज के कार्यकारिणी सदस्यों की विशेष भूमिका रही।

बस्तर संभाग हेड

अर्जुन देवांगन

9424287527

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